Hartalika Teej Vrat katha : हरतालिका तीज व्रत की पौराणिक कथा हिंदी में

Vrat Tyohar Upay

हरतालिका तीज व्रत की पौराणिक कथा –

विवाहित जीवन को खुशाल बनाने के लिये इस दिन किये जाने वाले व्रत को श्रेष्ठ और उत्तम मन जाता है। इस दिन सुहागिन महिलाये और कुंवारी लड़किया व्रत करती है। इस दिन महिलाएं पति की लंबी आयु, संतान प्राप्ती और सुखी जीवन के लिए व्रत रखती है। वही कुंवारी लड़किया मनचाहे पति के लिए इस व्रत को करती है। इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती की आराधना की जाती है इस दिन महिलाये निर्जला रहकर व्रत को पूरा करती है।

भगवान शिव ने माता पार्वती को हरतालिका तीज के व्रत के बारे में बताया था.और माता पार्वती जी को उनके पिछले जन्म में की गई भक्ति और उपासना के बारे में ज्ञात कराया था। पौराणिक कथा के अनुसार मां गौरी ने पार्वती के रूप में हिमालय के घर में जन्म लिया था। माता गौरा बचपन से ही भगवान शिव को वर के रूप में प्राप्त करना चाहती थीं और इसके लिए उन्होंने 12 साल तक कठोर तपस्या भी की माता पार्वती ने इस तपस्या के दौरान अन्न और जल ग्रहण नहीं किया था। चलिए प्रारम्भ करते है हरतालिका तीज व्रत कथा वर्णन भगवान जी के द्वारा पार्वती माता के लिए।

शिव भगवान बोले हे गौरा, पिछले जन्म में तुमने मुझे पाने के लिए बहुत छोटी उम्र में कठोर तप और घोर तपस्या की थी। तुमने ना तो कुछ खाया और ना ही पीया बस हवा और सूखे पत्ते चबाए। जला देने वाली गर्मी हो या कंपा देने वाली ठंड तुम नहीं हटीं। डटी रहीं। बारिश में भी तुमने जल नहीं पिया। तुम्हें इस हालत में देखकर तुम्हारे पिता महाराज हिमालय दु:खी थे। उनको दु:खी देख कर मुनिश्रेष्ठ नारदमुनि जी महाराज हिमालय के पास आये और कहा कि मैं भगवान् विष्णु के भेजने पर यहां आया हूं। वह आपकी कन्या की से विवाह करना चाहते हैं। इस बारे में मैं आपकी राय जानना चाहता हूं।नारदजी की ऐसी बात सुनकर आपके पिता बोले अगर भगवान नारायण यह चाहते हैं तो उन्हें कोई आपत्ति नहीं।

परंतु जब तुम्हें इस विवाह के बारे में पता चला तो तुम दुःखी हो गईं। तुम्हारी एक सहेली ने तुम्हारे दुःख का कारण पूछा तो तुमने कहा कि मैंने सच्चे मन से भगवान् शिव का पति रूप में वरण किया है, किन्तु मेरे पिता ने मेरा विवाह विष्णुजी के साथ तय कर दिया है। मैं विचित्र धर्मसंकट में हूं। अब मेरे पास प्राण त्याग देने के अलावा कोई और उपाय नहीं बचा।
तुम्हारी सखी बहुत ही समझदार थी। उसने कहा-प्राण छोड़ने का यहां कारण ही क्या है? संकट के समय धैर्य से काम लेना चाहिए। भारतीय नारी के जीवन की सार्थकता इसी में है कि जिसे मन से पति रूप में एक बार वरण कर लिया, जीवनपर्यन्त उसी से निर्वाह करें। मैं तुम्हें घनघोर वन में ले चलती हूं जो साधना स्थल भी है और जहां तुम्हारे पिता तुम्हें खोज भी नहीं पाएंगे। मुझे पूर्ण विश्वास है कि ईश्वर अवश्य ही तुम्हारी सहायता करेंग।

तुमने ऐसा ही किया। तुम्हारे पिता तुम्हें घर में न पाकर बड़े चिंतित और दुःखी हुए। इधर तुम्हारी खोज होती रही उधर तुम अपनी सहेली के साथ नदी के तट पर एक गुफा में मिटटी के शिवलिंग बनाकर मेरी आराधना में लीन रहने लगीं। तुम्हारी इस कठोर तपस्या के प्रभाव से मेरा आसन हिल उठा और मैं शीघ्र ही तुम्हारे पास पहुंचा और तुमसे वर मांगने को कहा तब अपनी तपस्या के फलीभूत मुझे अपने समक्ष पाकर तुमने कहा, मैं आपको सच्चे मन से पति के रूप में वरण कर चुकी हूं। यदि आप सचमुच मेरी तपस्या से प्रसन्न होकर यहां पधारे हैं तो मुझे अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार कर लीजिए। तब तथास्तु कहकर मैं कैलाश पर्वत पर लौट गया।
उसी समय गिरिराज अपने बंधु-बांधवों के साथ तुम्हें खोजते हुए वहां पहुंचे। तुमने सारा वृतांत बताया और कहा कि मैं घर तभी जाउंगी अगर आप महादेव से मेरा विवाह करेंगे। तुम्हारे पिता मान गए औऱ उन्होने हमारा विवाह करवाया। इस व्रत का महत्व यह है कि मैं इस व्रत को पूर्ण निष्ठा से करने वाली प्रत्येक स्त्री को मनवांछित फल देता हूं। इस पूरे प्रकरण में तुम्हारी सखी ने तुम्हारा हरण किया था इसलिए इस व्रत का नाम हरतालिका व्रत हो गया।
इस व्रत से जुड़ी एक मान्यता यह है कि इस व्रत को करने वाली स्त्रियां पार्वती जी के समान ही सुखपूर्वक पतिरमण करके शिवलोक को जाती हैं।

सौभाग्यवती स्त्रियां अपने सुहाग को अखंड बनाए रखने और अविवाहित युवतियां मन मुताबिक वर पाने के लिए हरितालिका तीज का व्रत करती हैं। इस दिन व्रत करने वाली स्त्रियां सूर्योदय से पूर्व ही उठ जाती हैं और नहा कर पूरा श्रृंगार करती हैं।

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